डॉ.सुबोध कुमार: कभी साबुन बेचकर चलाया गुजारा, आज डॉक्टर बन लौटा चुके हैं 37हज़ार बच्चों की मुस्कान

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डॉक्टर को धरती का भगवान कहना गलत नहीं होगा। लेकिन आज इस निस्वार्थ सेवा को धंधे का रूप दे दिया गया है। आज इलाज के नाम पर मरीजों को लूटा जा रहा है। ऐसे में कुछ लोग ऐसे हैं जिनके पास दो वक़्त की रोटी तक नहीं है इसलिए वे इलाज से भी वंचित रह जाते हैं।

लेकिन आज हम आपको एक ऐसे डॉक्टर की दरियादिली के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने हजारों बच्चों के चेहरे की मुस्कान को वापस लौटाया है। इस डॉक्टर का नाम डॉ. सुबोध कुमार है। सुबोध अब तक 37 हज़ार बच्चों की फ्री और सफल क्लेफ्ट-लिप सर्जरी कर चुके हैं। आइए जानते हैं डॉ. सुबोध कुमार के बारे में।

डॉ. सुबोध ने लौटाई बच्चों के चेहरे की मुस्कान

हम बात कर रहे हैं डॉ. सुबोध कुमार के बारे में जो आज अनेकों लोगों के लिए उनके भगवान बन चुके हैं। सुबोध कुमार ने हजारों बच्चों को जिंदगी जीने का जरिया दिया है। आज हर कोई सुबोध के सराहनीय कार्य की तारीफ कर रहा है।

The New Indian Express के मुताबिक अब तक सुबोध करीब 37 हज़ार बच्चों की फ्री लिप-क्लेफ्ट सर्जरी कर चुके हैं। इस सर्जरी के बाद हजारों बच्चों के चेहरे की मुस्कान एक बार फिर वापस लौट आई है। बता दें कि लिप क्लेफ्ट एक सामान्य जन्मजात स्थिति है जिसमें तालू और होंठ कटा होता है जिसके कारण बच्चों को बोलने, खाने यहाँ तक कि मुंह खोलने में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

photo/thenewindianexpress

डॉ. सुबोध ने भी किया था संघर्षों का सामना

बता दें कि डॉ. सुबोध का जीवन भी आसान नहीं रहा। अपने जीवन में डॉ. सुबोध ने कई मुश्किलों का सामना किया था। दरअसल सुबोध के पिता ज्ञान सिंह रेलवे में क्लर्क के तौर पर काम करते थे। लेकिन 1979 में सुबोध के पिता का देहांत हो गया। उस समय सुबोध सिर्फ 13 वर्ष के थे। सुबोध के माता पिता ने अपने बच्चों को हमेशा से जरूरतमंदों की मदद करने के लिए प्रेरित किया था। इसके बाद ही सुबोध के मन में डॉक्टर बनने का विचार आया था।

पिता के देहांत के बाद सुबोध के घर में आर्थिक तंगी आ गई। सुबोध का परिवार एक छोटे से रेलवे क्वार्टर में रहा करता था। अपने परिवार को चलाने के लिए सुबोध अपने बड़े भाई के साथ साबुन और चश्में बेचा करते थे। हालांकि कुछ समय बाद सुबोध के भाई को रेलवे में नौकरी तो मिली लेकिन वो नौकरी परिवार चलाने के लिए काफी नहीं थी।

1982 में सुबोध के भाई को 579 रूपये का पहला बोनस मिला जिसे सुबोध के भाई ने सुबोध की मेडिकल टेस्ट की तैयारी में लगा दिया। लेकिन फिर सुबोध भी  कड़ी मेहनत से अपनी भाई की उम्मीदों पर खरे उतरे और एक नहीं दो नहीं बल्कि तीन मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास की। सुबोध ने AFMC-Pune, BHU-PMT और CPMT टेस्ट को पास किया था जिसके बाद उन्होंने BHU से पढ़ाई पूरी की।

ऐसे शुरू हुआ बच्चों की मुस्कान लौटाने का सिलसिला

2002 में सुबोध ने अपने पिता की पुण्यतिथि पर फ्री ट्रीटमेंट वीक का आयोजन  किया। इसके बाद 2003 में सुबोध स्माइल ट्रेन प्रोजेक्ट का हिस्सा बन गए और लिप क्लेफ्ट सर्जरी करना शुरू कर दिया। शुरुआत में सुबोध और STP ने 2500 सर्जरी का लक्ष्य रखा था। 2008 से 2009 के बीच सुबोध ने टीम के साथ मिलकर करीब 4000 फ्री क्लेफ्ट सर्जरी की थी।

इसके साथ साथ सुबोध ने देश के ऐसे बच्चों को ढूँढना शुरू किया जो इस बीमारी से ग्रसित हैं। इसके साथ साथ सुबोध कुपोषित बच्चों के भी न्यूट्रिशियन का भी ध्यान रखते हैं। मालदा के रहने वाले कार्तिक के बेटे का इलाज भी सुबोध ने ही किया था इसलिए आज कार्तिक सुबोध को किसी भगवान से कम नहीं मानते।

The Smile Train Project ने अपने इस कार्यक्रम पर 39 मिनट की एक डॉक्युमेंट्री भी तैयार की थी जिसका नाम “Smile Pinki” है। इसके अलावा सुबोध अपने टीम एक साथ करीब 6 हज़ार बर्न सर्जरी भी कर चुके हैं। वाकई आज डॉ. सुबोध अनेकों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।

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