रियल शेरशाह ने बढ़िया नौकरी को छोड़ चुनी देश सेवा, हँसते हँसते देश के लिए त्यागे थे प्राण

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विक्रम बत्रा का नाम आज हर किसी की ज़ुबान पर है। विक्रम बत्रा ने देश के लिए जो किया वो वाकई काबिल ए तारीफ है। विक्रम के बलिदान को भारत कभी नहीं भूल सकता। आज विक्रम बत्रा की 47वीं बर्थ एनिवर्सरी है। इसलिए आज हम आपको विक्रम बत्रा से जुड़ी कुछ खास बातें बताने जा रहे हैं। हालांकि तो विक्रम बत्रा के बारे में जितना बताया जाए उतान कम है। विक्रम के जीवन पर फिल्म भी बन चुकी हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि विक्रम बत्रा ने बढ़िया करियर को छोड़कर देश सेवा को चुना था। विक्रम ने कारगिल युद्ध में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को निभाया और कई चोटियों पर फतेह की।

विक्रम का शुरुआती जीवन 

विक्रम का जन्म हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में 9 सितंबर 1947 को हुआ था। विक्रम के पिता गिरधारीलाल सरकारी स्कूल के प्रिन्सिपल थे और उनकी माँ स्कूल टीचर थी। भारतीय सेना में विक्रम को शेरशाह के नाम से पुकारा जाता था। विक्रम शुरुआत से ही पढ़ने में बहुत होशियार थे। पढ़ाई के साथ साथ विक्रम खेलों में भी अव्वल थे। विक्रम ने राष्ट्रीय स्तर पर टेबल टेनिस और कराटे भी खेले हैं।

बढ़िया नौकरी को छोड़ चुनी देश सेवा 

विक्रम ने शुरुआती पढ़ाई पालमपुर से ही पूरी की। इसके बाद विक्रम स्नातक की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ आ गए। स्नातक के दौरान ही विक्रम को एनसीसी का प्रमाण पत्र भी मिल गया जिसके बाद विक्रम ने गणतन्त्र दिवस की परेड में भाग लिया। स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही विक्रम मर्चेन्ट नेवी के लिए हाँगकाँग की कंपनी में चुने गए थे। लेकिन विक्रम ने इस नौकरी को छोड़ देश सेवा चुनी। 1996 में विक्रम इंडियन मिलिट्री अकादमी से जुड़े और मानेकशॉ बटालियन का हिस्सा बन गए।

कारगिल के युद्ध में दिखाया था अदम्य साहस

प्रशिक्षण के 2 वर्ष बाद ही विक्रम को जंग लड़ने का मौका मिला। 1997 में विक्रम को जम्मू के सोपोर में 13 जम्मू कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्त किया गया और 1999 में वे कैप्टन के पद पर पहुँच गए। इसी वर्ष शुरू हुआ कारगिल युद्ध। सबसे पहले विक्रम और उनकी टीम को 5140 चोटी को फतेह करने की ज़िम्मेदारी दी गई। इस ज़िम्मेदारी को विक्रम ने 20 जून 1999 को पूरा किया। इसी जीत के बाद विक्रम ने रेडियो पर कहा था “ये दिल मांगे मोर”

24 वर्ष की उम्र में मिला परमवीर चक्र

5140 चोटी को फतेह करने के बाद विक्रम और उनकी टीम को 4875 की चोटी को फतेह करना था। इस बार विक्रम को सफलता तो मिली लेकिन उन्हें गंभीर चोटे आई थी। 7 जुलाई 1999 को विक्रम ने अपनी टीम के साथ कई पाकिस्तानी सैनिकों को हराया और हँसते हँसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। आज भी विक्रम की शहादत को कोई भूल नहीं पाया है। 24 वर्ष की उम्र में विक्रम को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। आज भी 4875 की चोटी को विक्रम बत्रा टॉप के नाम से जाना जाता है।

 

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