भारत की पहली महिला जिसने विदेश जाकर हासिल की थी डॉक्टरी की डिग्री, लेकिन सपना रह गया अधूरा

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आज हम सभी आधुनिक भारत में रह रहे हैं। लेकिन आज भी कुछ कामों को महिलाओं और पुरुषों में बांटा हुआ है। आज भी कई लोगों के अनुसार ऐसे कुछ काम हैं जो महिलाएं नहीं कर सकती। हालांकि महिलाओं ने अपनी सफलता से ऐसा सोचने वालों का मुंह बंद कराया है। इतिहास में भी ऐसे कई नाम हैं जिनके सराहनीय कार्यों ने नारी सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया था। आज हम आपको एक ऐसी ही महिला के बारे में बताने जा रहे हैं जो भारत की पहली महिला डॉक्टर बनी थी। इस महिला ने विदेश जाकर डॉक्टरी की डिग्री को हासिल किया था। लेकिन एक सपना जो इस महिला ने देखा था वे अधूरा ही रह गया।

महज 9 वर्ष की उम्र में हो गया था विवाह

आज हम आपको भारत की पहली महिला डॉक्टर आनंदीबाई जोशी के बारे में बताने जा रहे हैं। आनंदीबाई का जन्म 1865 में महाराष्ट्र में हुआ था। जन्म के समय आनंदीबाई का नाम यमुना था। आनंदीबाई का महज 9 वर्ष की उम्र में उनकी उम्र से तीन गुना ज्यादा बड़े गोपाल जोशी से विवाह करा दिया गया। गोपाल ने शादी से पहले शर्त रखी थी कि वे आनंदीबाई को पढ़ाना चाहते हैं। शादी के बाद गोपाल ने आनंदीबाई को मराठी, संस्कृत और अंग्रेजी पढ़ाई।

ANANDI BHAI JOSHI
फोटो / THE BETTER INDIA – ANADI BHAI JOSHI

एक हादसे ने बना दिया डॉक्टर

आरमतौर पर सुना जाता है कि पुराने समय में घर के काम न करने पर महिलाओं की पिटाई की जाती थी लेकिन एक बार आनंदीबाई पढ़ाई छोड़कर घर का काम कर रही थी तब उनके पति ने आनंदीबाई की पिटाई कर दी। 14 वर्ष की उम्र में आनंदीबाई एक बच्चे की माँ बन गईं। लेकिन चिकित्सा का अभाव होने के कारण महज 10 दिन के अंदर बच्चे का देहांत हो गया। इस घटना से आनंदीबाई टूट गईं। तभी उन्होंने डॉक्टर बनने का ठाना ताकि बाकी लोगों को चिकित्सा सेवा दे सके। इस फैसले से आनंदीबाई के पति भी बेहद खुश थे।

अमेरिका जाकर शुरू की डॉक्टरी की पढ़ाई

अपने इस फैसले के बाद आनंदीबाई ने पेंसिलवेनिया के महिला मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए आवेदन किया और उन्हें दाखिला भी मिल गया। 19 वर्ष की उम्र में आनंदीबाई ने मेडिकल प्रशिक्षण शुरू कर दिया। लेकिन शुरुआत से ही आनंदीबाई काफी बीमार रहती थी और फिर अमेरिका जाकर वे और ज्यादा बीमार रहने लगीं। इस दौरान आनंदीबाई को टीबी की समस्या भी हो गई। लेकिन आनंदीबाई ने पढ़ाई नहीं छोड़ी और अपनी एमडी की पढ़ाई को पूरा किया।

सपना रह गया अधूरा

आनंदीबाई के प्रयासों की लोकमान्य तिलक और रानी विक्टोरिया ने भी खूब तारीफ की थी। 1886 में जब आनंदीबाई भारत वापस आईं तो उनका ज़ोरों शोरों से स्वागत किया गया। आनंदीबाई को महाराष्ट्र के कोल्हापुर के अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल का फिजीशियन इंचार्ज बनाया गया। आनंदीबाई का सपना था कि वे खुद का एक मेडिकल कॉलेज शुरू करें लेकिन महज 22 वर्ष की उम्र में आनंदीबाई का निधन हो गया। जिसके कारण आनंदीबाई का सपना अधूरा ही रह गया।

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