अर्जुन की तरह केवल चिडिय़ा की आंख पर होना चाहिए निशाना, गरीब परिवार में जन्में देशलदान ने आईएएस बनकर इस बात को कर दिया साबित

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NEW  DELHI: महाभारत में पांडवों के शिक्षा ग्रहण के दौरान जब गुरू द्रोणाचार्य अपने शिष्यों की परीक्षा लेने की सोचते है तो वह सबको बुलाते है। वह सबको एक पेड़ पर बैठी चिडिय़ा का निशाना लगाने के लिए कहते है। इससे पहले वह पूछते है आपको वहां पर क्या दिख रहा है। कोई पेड़ बताता है, कोई चिडिय़ा बताता है केवल अर्जुन ही कहते है कि उनको केवल चिडिय़ा की आंख दिख रही है। इस बात के कई गहरे मायने है। जिससे एक शिक्षा मिलती है कि आपको केवल अपने लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिए। इस बात को आईएएस देशलदान ने भी साबित कर दिया।

गरीब परिवार में पैदा हुए देशलदान

देशलदान का जन्म राजस्थान के जैसलमेर जिले में हुआ। वह कुछ सात भाई बहन थे। परिवार काफी गरीब था। सिर्फ दो भाईयों को छोडक़र पूरे परिवार में कोई भी एजुकेशन हासिल नहीं कर सका। देशलदान ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने बचपन से ही पिता को चाय की दुकान पर काम करते हुए देखा था। ऐसे में आईएएस और सिविल सर्विस जैसे शब्द तो उसकी पहुंच से ही दूर थे।

बड़े भाई करते थे पढ़ाई के प्रेरित

देशल दान रतनु के बड़े भाई इंडियन नेवी में थे। वह देशल को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते थे। यहीं से देशल के मन में पढ़ाई का जुनून पैदा हुआ। वह पढ़ाई के दौरान सिविल सर्विस के बारे में सोच ही रहे थे कि उनके भाई का निधन हो गया। उनकी पोस्टिंग आईएएनएस सबमरीन में थी।

कठित परिस्थितियों में किया कोटा जाने का फैसला

देशलदान ने कठिन परिस्थितियों में कोटा जाने का फैसला किया। कोटा से पहले उन्होंने बारहवीं की परीक्षा दी। फिर आईआईटी की परीक्षा भी दी। जेईई की परीक्षा में उनको आईआईटी जबलपुर जाने का मौका मिला। आईआईटी करते हुए भी उनका ध्यान सिविल सर्विस पर था।

परिवार की स्थिति को देखते हुए नहीं कर सकते थे दो से अधिक प्रयास

देशलदान परिवार की खराब स्थिति को देखते हुए दो से अधिक प्रयास नहीं कर सकते थे। उनको अपने परिवार को भी संभालना था। आईएएस की तैयारी को देखते हुए उन्होंने दिल्ली का रूख किया। लेकिन दिल्ली आने से पहले वह यह तय कर चुके थे कि तैयारी को कितना समय देना है। क्योंकि वह आईएएस तैयारी में अधिक समय बेकार नहीं कर सकते थे। वहीं दिल्ली में लंबे समय तक गुजारा करना भी मुश्किल था।

साल 2017 में रतनु ने हासिल की 82वी रैंक

रतनु बताते है कि साल 2017 में उन्होंने 82 रैंक हासिल की। यह परिणाम उनकी खुद की मेहनत का था। उन्होंने कही से भी कोचिंग नहीं ली थी। रतनु के अनुसार अगर आप मेहनत के बल पर परिणाम हासिल करना चाहते थे तो उसका रास्ता लंबा जरूर हो सकता है लेकिन सफलता अवश्य मिलता है। वह हमको असफलता से न घबराते हुए केवल अपने लक्ष्य पर ही फोकस रखना चाहिए। बिना लक्ष्य निर्धारित किए कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है।

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