Friday, June 18, 2021

अल्बर्ट आंइस्टीन भी थे इस भारतीय वैज्ञानिक के कायल, 1954 में सबसे पहले इनको मिला था पदमभूषण 

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New delhi : दुनिया भर में कई वैज्ञानिक हुए, लेकिन नाम सिर्फ एक दो के ही याद रखे जाते है। इन वैज्ञानिकों में सबसे ऊपर आता है अल्बर्ट आंइस्टीन। ऐसे वैज्ञानिक जिनका नाम पूरी दुनिया में लिया जाता है। इनको विद्युत उत्सर्जन की खोज के लिए साल 1921 में नोबेल पुरस्कार दिया गया था। लेकिन अल्बर्ट आंइस्टीन भी एक भारतीय वैज्ञानिक के कायल थे। उनका नाम है बंगाल के सतेंद्र नाथ बोस

Satyender nath bose
सत्येन्द्र नाथ बोस फोटो /NEWJ GARV

रेलवे में काम करते थे सतेंद्र के पिता 

सतेंद्र के पिता सुरेंद्र रेलवे में काम करते थे। सतेंद्र अपनी छह बहनों में सबसे बडे भाई थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सतेंद्र पर भी अन्य युवाओं की तरह इसका प्रभाव पड़ा। जब लार्ड कर्जन ने बंगाल विभाग का फैसला किया तो सतेंद्र केवल 11 साल के थे। कोलकत्ता से हिंदू कालेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद पेे्रसीडेंसी कालेज में दाखिला लिया। उन्होंने विज्ञान में ग्रेजुएशन किया। साल 1915 में मिक्सड मैथमेटिक्स में एमएससी की पढ़ाई की।

Albert Einstein
अलबर्ट आंइस्टीन फोटो /NEWJ GARV

यूनिवर्सिटी आफ साइंस में की रिसर्च 

सतेंद्र ने यूनिवर्सिटी आफ साइंस में रिसर्च स्कॉलर के रूप में पढ़ाई की। जब यह रिसर्च कर रहे थे तो प्रथम विश्व युद्ध छिड़ चुका था। ऐसे में सतेंद्र को विज्ञान की लेटेस्ट किताबे नहीं मिल पाती थी। वहीं रिसर्च पेपर भी उस समय जर्मन और फ्रैंच भाषा में ही छपते थे। ऐसे में सतेंद्र ने दोनो भाषाएं सीख ली। सतेंद्र ने ही अल्बर्ट आइस्टीन की फ्रैच और जर्मन भाषा में प्रकाशित रिसर्च पेपर का सबसे पहले अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया।

Satyender nath bose
सत्येन्द्र नाथ बोस फोटो /facebook

आंइस्टीन को भेजे नतीजे वह हो गए कायल 

सतेंद्र ने जर्मन फिजिक्स मैक्स प्लांट का नतीजा क्लासीकल फिजिक्स की मदद लिए बिना निकाला था। इसके परिणाम को उन्होंने अल्बर्ट को भी भेजा। जिसके बाद अल्बर्ट सतेंद्र के कायल हो गए। दोनों ने एक साथ कई जगह काम किए।

विज्ञान में स्थानीय भाषा में पढ़ाए जाने की वकालत 

सतेंद्र विज्ञान को स्थानीय भाषा में पढ़ाए जाने की वकालत करते रहे। उन्होंने कहा कि अगर विज्ञान को किसी भी राज्य की स्थानीय भाषा में पढ़ाया जाएगा तो युवाओं को सीखने में अधिक मदद मिलेगी। इसलिए उन्होंने अपने कई रिसर्च पेपर बंगाली भाषा में लिखे। साल 1954 में उनका पदमभूषण दिया गया।

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