Monday, June 14, 2021

मां की मर्जी के बिना भी पढ़ी ये दिव्यांग लडक़ी, फिर उसने पूरा किया आईएएस बनने का अपना सपना

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नई दिल्ली। (UPSC Success Story) आज हम आपको एक ऐसी दिव्यांग लडक़ी के संघर्ष की कहानी बताने जा रहे हैं, जोकि आज के युवाओं के लिए बेहद ही प्रेरणा दायक है। इस दिव्यांग लडक़ी ने अपनी मां की मर्जी के बावजूद ना केवल उच्च शिक्षा हासिल की, बल्कि आईएएस (IAS) बनने का अपना सपना भी पूरा किया। कहते हैं कि अपने सपने को पूरा करने के लिए जिदद करना अच्छा होता है। इस लडक़ी ने भी खुद को काबिल बनाने के लिए अपनी मां की इच्छा के विपरित जाकर अपने सपने को पूरा किया। एक दिन जब वह कामयाब बनकर सामने आई तो समाज ने उसे उसकी मेहनत और निष्ठा के लिए सलाम करने में भी देर नहीं की।

इस बच्ची का परिवार बेहद गरीबी था

यह कहानी है राजस्थान के एक छोटे से गांव में रहने वाली उम्मूल खेर (Ummul Kher) की। उम्मूल का परिवार बेहद ही गरीबी में जीवन यापन कर रहा था। यह बच्ची जब मात्र पांच साल की थी, तब उनका परिवार रोजी रोटी की तलाश में राजस्थान छोडक़र दिल्ली आ गया। जहां इस परिवार ने हजरत निजामुददीन के पास एक बस्ती में अपनी झुगगी बना ली। मगर जब बारिश का मौसम आता तो उनके परिवार को मुश्किलें घेर लेती थी। साल 2001 में सरकार ने इस इलाके को साफ करने के लिए वहां से झुगगी बस्ती को हटा दिया।

पिता का काम भी खत्म हो गया

इसके बाद संकट में घिरे उम्मुल के परिवार ने परेशानियों के दिन देखने शुरू कर दिए। किसी तरह से उन्होंने हौंसला जुटाते हुए त्रिलोकपुरी में एक छोटा सा मकान किराए पर ले लिया। उम्मूल के पिता रेलवे स्टेशन के पास फुटपाथ पर सामान बेचकर किसी से गुजर बसर कर रहे थे। पंरतु घर बदलने के बाद उम्मूल के पिता का यह काम भी जाता रहा। परिवार बेहद ही संकट के दिनों से घिरा था। उम्मूल ने भी अपने परिवार की परेशानी को देखा और हौंसला जुटाया कि वह किसी तरह से अपने मां-बाप की सहायता करेगी।

उम्मूल ने टयूशन पढ़ाना शुरू किया

छोटी सी उम्र में जब बच्चे खेला कूदा करते हैं, तब पैरों से दिव्यांग उम्मूल (Battled Bone Disorder) ने बच्चों को टयूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। जिससे उम्मूल को पचास रुपए की फीस मिलती थी। इससे वह अपने परिवार की सहायता कर रही थी। इस बीच उम्मूल की सौतेली मां ने उसकी पढ़ाई छुडवाने का फैसला (Ummul Parents Unsupportive) किया और उसे वापिस गांव भेजने की तैयारी शुरू कर दी। उम्मूल को जैसे ही यह बात पता चली, वह नाराज हो गई। छोटी सी उम्र में उसने अपना घर छोडक़र अलग रहना शुरू कर दिया।

इस तरह से करती थी उम्मूल अपनी पढ़ाई

उम्मूल दिन में स्कूल जाती और वहां से वापिस आकर बच्चों को टयूशन पढ़ाती। इस तरह से कठिन संघर्ष और मेहनत करते हुए उम्मूल ने अपनी पढ़ाई जारी रखी हुई थी। उसकी मेहनत और लगन को देखते हुए दसवीं क्लास में एक सामाजिक संस्था ने उम्मूल की पढ़ाई का खर्च अपने कंधों पर ले लिया। इसके बाद उम्मूल अपनी पढ़ाई को लेकर इतनी मेहनत करने लगी कि 12 वीं कक्षा में उसने टॉप करके दिखाया। इससे उसके स्कूल के टीचर बहुत खुश हुए। इसके बाद उम्मूल ने डीयू में एडमिशन ले लिया और वहां से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की।

आईएएस में पाई 420 वीं रैंक

इसके बाद उम्मूल ने जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी ने हायर स्टडीज के लिए दाखिला ले लिया। वहां से पीएचडी करने के साथ साथ इस लडक़ी ने अपनी दिव्यांगता को मात देते हुए यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी। अपने पहले ही प्रयास में उसने 420 वीं रैंक हासिल कर ली। इस तरह से उम्मूल ने अपनी मेहनत, निष्ठा और समर्पण भाव से यह साबित कर दिया कि यह आपके अंदर मजबूत इच्छाशक्ति है तो फिर कोई भी मुश्किल आपको आपकी मंजिल पर पहुंचने से नहीं रोक सकती।

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