छह साल की उम्र में चली गई आंखों की रोशनी, कानूनी लड़ाई के बाद हासिल की IAS की मंजिल

कई लोगों के जीवन में भगवान इतना अधिक संघर्ष लिख देता है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है।

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आईएएस अधिकारी राजेश कुमार (rajesh kumer ) का संघर्ष भी काफी लंबा रहा। यह संघर्ष (struggle) कभी किसी विषय या समाज से नहीं बल्कि अपने आप से ही था। छह साल की उम्र में राजेश की आंख में गेंद (ball )लग गई। जिससे इनकी आंख की रोशनी चली गई। इस घटना से राजेश का पूरा परिवार काफी दुखी हुआ। उन्हें ऐसा लगा कि राजेश का जीवन बर्बाद हो जाएगा। लेकिन होनी को कुछ ओर ही मंजूर था।

कमजोरी को बनाया अपनी ताकत

राजेश ने अपनी कमजोरी को ही ताकत बनाया। पटना (patna ) के रहने वाले राजेश का पैतृक गांव जिले के धनरुआ प्रखंड में स्थित है। राजेश के पिता रविंद्र कुमार पटना सिविल कोर्ट (patna civil court)में अधिकारी है। राजेश बचपन से ही पढ़ाई लिखाई में काफी होशियार थे। स्कूली पढ़ाई में भी उन्होंने कई क्लास में टाप किया था।
आंखों की रोशनी जाने के बाद ब्रेल लिपी से शुरू की पढ़ाई
राजेश की आंखों की रोशनी जाने के बाद उन्होंने बे्रल लिपी से पढ़ाई शुरू की। वहीं जिस क्रिकेट की वजह से उनके जीवन में अंधेरा आया था। उस क्रिकेट से नफरत होने के बजाय उनको मोहब्बत हो गई। राजेश नेत्रहीन क्रिकेट टीम के सदस्य रहे। उन्होंने 1998, 2002 और 2006 में विश्व कप भी खेला।

देहरादून के मॉडल स्कूल में की पढ़ाई

राजेश ने देहरादून के मॉडल स्कूल में पढ़ाई की। कालेज की पढ़ाई के लिए वह दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंचे। डीयू से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने जेएनयू में प्रवेश के इंट्रेस दिया। उन्होंने इतिहास विषय में एमए की डिग्री ली।

दिव्यांग श्रेणी में तीसरे स्थान पर रहे राजेश

राजेश को जेएनयू से ही यूपीएससी में बैठने की प्रेरणा मिली। वह दिव्यांग श्रेणी में तीसरे स्थान पर रहे। फिर भी उन्हें आईएएस का पद नहीं मिला। सरकार का कहना था कि पूरे तरह से नेत्रहीन होने के कारण राजेश को आईएएस का पद नहीं दिया जा सकता। इसके लिए राजेश ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आईएएस के लिए दृष्टि नहीं दृष्टिकोण की जरूरत होती है। अंत में राजेश को आईएएस बनाया गया।

 

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